डॉक्टर की कुर्सी पर बैठकर फार्मासिस्ट ने देखे मरीज, लिखे प्रिस्क्रिप्शन
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मिहींपुरवा में स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल, बाहर की जांच व दवाएं लिखे जाने का भी आरोप

डॉक्टर की कुर्सी पर बैठकर फार्मासिस्ट ने देखे मरीज, लिखे प्रिस्क्रिप्शन
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मिहींपुरवा में स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल, बाहर की जांच व दवाएं लिखे जाने का भी आरोप
मिहींपुरवा, बहराइच। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मिहींपुरवा में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि अस्पताल में तैनात एक फार्मासिस्ट ने चिकित्सक की अनुपस्थिति के दौरान डॉक्टर की कुर्सी पर बैठकर मरीजों को देखा और उनके लिए प्रिस्क्रिप्शन भी तैयार किए। इतना ही नहीं, कुछ मरीजों को बाहर से जांच कराने तथा बाहर की दवाएं लेने की सलाह दिए जाने की बात भी सामने आई है। मामले से संबंधित साक्ष्य उपलब्ध होने का दावा किया गया है।
जानकारी के अनुसार मामला उस समय का बताया जा रहा है जब शाम करीब 5:28 बजे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मिहींपुरवा की इमरजेंसी व्यवस्था का जायजा लिया गया। इस दौरान कथित रूप से ड्यूटी पर मौजूद चिकित्सक डॉ. प्रमोद चाय पीने के लिए गए हुए थे। इसी दौरान उनकी कुर्सी पर बैठकर फार्मासिस्ट द्वारा मरीजों को देखने और दवाएं लिखने का आरोप है।
प्रत्यक्ष रूप से सामने आए मामले में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर चिकित्सक की अनुपस्थिति में किसी फार्मासिस्ट को मरीजों का परीक्षण करने और उनके उपचार संबंधी प्रिस्क्रिप्शन लिखने का अधिकार किसने दिया। यदि चिकित्सक किसी कारणवश कुछ समय के लिए इमरजेंसी से बाहर गए थे, तो उनकी अनुपस्थिति में मरीजों को देखने की जिम्मेदारी किस चिकित्सा अधिकारी के पास थी, यह भी जांच का विषय बन गया है।
अधीक्षक ने कहा—फार्मासिस्ट को मरीज देखने व दवा लिखने का अधिकार नहीं
मामले को लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मिहींपुरवा के अधीक्षक डॉ. महेश कुमार विश्वकर्मा से जानकारी ली गई। उनसे पूछा गया कि क्या अस्पताल प्रशासन की ओर से किसी फार्मासिस्ट को विशेष अधिकार दिया गया है कि वह मरीजों को देख सके और उनके लिए दवाएं लिख सके। इस पर अधीक्षक ने स्पष्ट रूप से इससे इनकार करते हुए कहा कि मरीज को देखने और दवा लिखने का अधिकार चिकित्सा अधिकारी का है, फार्मासिस्ट को यह अधिकार नहीं है।
अधीक्षक के इस बयान के बाद अस्पताल में फार्मासिस्ट द्वारा कथित तौर पर मरीजों को देखने और प्रिस्क्रिप्शन लिखने का मामला और भी गंभीर हो गया है। सवाल यह है कि यदि फार्मासिस्ट को ऐसा करने का अधिकार नहीं है तो अस्पताल परिसर में कथित रूप से ऐसा कैसे होता रहा और जिम्मेदार अधिकारियों की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ी।
बाहर की जांच और दवाएं लिखे जाने का भी आरोप
मामले में कुछ मरीजों को अस्पताल के बाहर से जांच कराने तथा बाहर की दवाएं लेने की सलाह दिए जाने के आरोप भी लगाए गए हैं। यदि जांच में यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किन परिस्थितियों में मरीजों को बाहर की जांच या दवा के लिए भेजा गया और क्या इसके पीछे कोई चिकित्सकीय आवश्यकता थी।
स्वास्थ्य केंद्र में आने वाले मरीज सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा करके उपचार के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में यदि किसी गैर-चिकित्सकीय पद पर तैनात कर्मचारी द्वारा चिकित्सक की भूमिका निभाने जैसी स्थिति सामने आती है तो इससे मरीजों की सुरक्षा और उपचार की गुणवत्ता को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा होना स्वाभाविक है।
अब स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई पर टिकी निगाहें
मामले में सबसे बड़ा सवाल अब स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों की भूमिका को लेकर है। क्या विभाग इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराएगा? क्या संबंधित फार्मासिस्ट से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा? क्या उपलब्ध बताए जा रहे साक्ष्यों की जांच की जाएगी? अथवा मामला केवल खानापूर्ति तक सीमित रह जाएगा?
स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बेहतर और सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना विभाग की जिम्मेदारी है। यदि कोई कर्मचारी अपने निर्धारित दायित्व से आगे बढ़कर चिकित्सक का कार्य करता पाया जाता है तो ऐसे मामलों में स्पष्ट जवाबदेही तय होनी चाहिए।
फिलहाल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मिहींपुरवा में सामने आए इस मामले ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि उच्चाधिकारी मामले का संज्ञान लेकर जांच और कार्रवाई करते हैं या फिर यह मामला भी जांच के नाम पर ठंडे बस्ते में चला जाता है।




